Press Release

19th February 2021

Issued by

National Alliance of People’s Movements

Coalition for Environmental Justice in India

People’s Union for Civil Liberties

Watch the entire Press Conference here:

A group of prominent people, including artists, environmental and social activists, parents, teachers, professionals, adivasis, dalits and farmers, today spoke out against  the illegal and disproportionate response of the government in targeting young activists, including Disha Ravi, and the government’s intent to criminalise dissent. At a press conference organised today, Kavita Srivastava, Nagraj Adve, Ram Wangkheirakpam, Sandeep Pandey, TM Krishna, Meera Sanghamitra, Abhilasha Singh, Ashish Kothari, Nityanand Jayaraman, Leo Saldanha, Vinay Sreenivasa, Miloon Kothari, Manshi Asher representing a wide cross-section of society, spoke or responded about these concerns.

The ongoing attack on youth climate activists by the Indian state is symptomatic of a growing trend to deal with the democratic right to freedom of speech and dissent with an authoritarian hand, instead of engaging in dialogues as would be befitting of a truly democratic nation. The manner in which Disha Ravi, a young 22 year climate activist has been treated, has the hallmarks of a state that is readily willing to flout rule of law and established procedural norms, instead of listening to the country’s youth. The warrants issued against two more young people, Nikita Jacob and Shantanu Muluk, and the selective ‘leaks’ to the media from Disha’s private messages, are all attempts to paint these young people as part of an international conspiracy to destabilise India.

These actions are aimed at diverting public attention from the most pressing needs of the nation, such as the farmers’ crisis, the ecological collapse, and the economic insecurity of hundreds of millions of people, all intensified by the ongoing selling out of natural resources to corporate interests. Rather than put all its attention into tackling these issues, the government is cooking up patently false narratives of conspiracy and terrorism. There is nothing seditious in the actions of the young people being targeted, or of tens of thousands of other youth involved in social and environmental issues. Challenging the state for its lack of attention to their collective futures and the future of the country is not an act of sedition.

Unable and unwilling to engage with the protesting farmers, the Government is busy trying to use the Khalistani brush to tarnish their movement and those who support them, including now the youth environmental activists. This is shameful over-reach and characteristic of a bully state.

The disturbingly frequent use of undemocratic laws like UAPA, or the ease with which charges of colonial era sedition charges are being levelled, is far higher and more frequently employed than even during colonial times! These have been used against many senior activists, professionals, educators, journalists and others; now they are being used against very young people.

As teachers, parents, researchers, environmental and social activists, adivasis, dalits, farmers, and professionals  from and also representing a wide range of movements, networks and sectors, we are very deeply concerned about these actions of the Central Government. Such actions indicate the tendencies of the Indian state moving towards more authoritarianism. More than 35,000 people have condemned the government’s actions, and called for upholding the democratic traditions of India:

In light of the above, we demand that: 

  1. Disha Ravi must be released immediately withdrawing all charges made against her. Warrants against Shantanu Muluk and Nikita Jacob must also be dropped, and no further action should be taken against youth who have been supporting the farmers’ movement and social and environmental justice causes.
  2. An open dialogue must be initiated with youth environmental and social action groups and their well-justified concerns about their futures, to come up with policies and programmes that can safeguard India’s present and future generations.
  3. A national level, transparent review of legal provisions like sedition, and of laws like UAPA, must be initiated with the intent of replacing them with provisions and laws that help secure the people of India within a framework of constitutionally endowed democratic rights.
  4. All processes of decision-making on development, environment and livelihoods must be deeply democratised, ensuring the core involvement of vulnerable communities and sections (including women, youth, ‘disabled’, and LGBTQ+), and affected or interested citizens.



Ashish Kothari,  

Leo F. Saldanha, Coalition for Environmental Justice in India,

Meera Sanghamitra, National Alliance of People’s Movements,   

Kavita Srivatsava, Peoples Union for Civil Liberties,  


प्रेस विज्ञप्ति 19 फरवरी 2021

भारत का भविष्य सुरक्षित करने के लिए युवाओं से संवाद करो: अभिभावकों, शोक्षकों और कार्यकर्ताओं का भारत सरकार को संदेश!

जारीकर्ता: जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, पर्यावरणीय न्याय के लिए गठबंधन और पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज

प्रेस वार्ता वक्ता:
कविता श्रीवास्तव, नागराज आडवे, राम वांगखैरकपम, संदीप पांडे, मीरा संघमित्र, टी एम कृष्ण, अभिलाषा सिंह, आशीष कोठारी, नित्यानंद जयरामन, लियो सलदाना, विनय श्रीनिवासन, मिलून कोठारी, मांशी अशर और अन्य साथी

देश के प्रमुख प्रगतिशील सामाजिक, दलित-आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ अभिभावकों, शोक्षकों, कलाकारों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने आज सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले युवाओं पर दमन और खासकर दिशा रविे की गैर कानूनी गिरफ्तारी का विरोध किया।

जलवायु संकट पर कार्यरत युवाओं पर भारत सरकार द्वारा लगातार किये जा रहे हमले देश में लोकतांत्रि अधिकारों खासकर अभिव्यक्ति के अधिकार के हो रहे हनन का हिस्सा है। एक सच्चे लोकतंत्र में जनता की असहमति को संवाद से न कि दबंगाई से निबटना चाहिये।

22 वर्षीय दिशा रवि के खिलाफ की गई कार्यवाही, राज्य की न्याय व्यवस्था और विधि शासन की सीधे तौर पर अवहेलना है। दिशा के अलावा एडवोकेट निकिता जेकब और शांतनु मलिक के खिलाफ जारी वारंट और मीडिया ट्रायल जो उनको देश विरोधी अंतराष्ट्रीय षड्यंत्र रचने जैसे झूठे और बेबुनियाद इल्ज़ामों के घेरे में डाल रहे हैं यह भी पूरी तरह से गैर कानूनी है।

स्पष्ट है कि यह अवांछनीय और जनविरोधी कार्यवाही केवल और केवल आज के जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति का हिस्सा है। कृषि संकट, बेरोज़गारी, चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रकृति पतन जैसी चुनौतियों से घिरे देश मे सरकार और राज्य व्यवस्था का ध्यान इन झूठे षड्यंत्रों की अंटशंट कहानीयां रचने में लगा हुआ है ये अत्यंत चिंताजनक है. युवा कार्यकर्ताओं द्वारा शांतिपूर्ण विरोध या आनदोलन करना किसी भी नज़र से देश द्रोह नहीं है. देश की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए चिंतित हो कर सामाजिक बेहतरी के लिए आवाज़ उठाना कोई देश द्रोह नहीं.

कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्षरत किसानों के साथ संवाद करने के लिए अनिच्छुक सरकार पहले दिन से किसानों और इस आन्दोलन के समर्थकों को खालिस्तानी का लेबल दे कर नकारने में लगी है. इसमें पुलिस और भाजपा के नेताओं की भूमिका निंदनीय रही है जो लगातार आन्दोलनकारियों को ‘खालिस्तानी’ बताने के लिए कार्यरत है और अब युवा पर्यावरण कार्यकर्ताओं को भी इन झूठे इल्जामों में फसाया जा रहा है. यह बेहद शर्मनाख है और दबंगई से राज्य व्यवस्था का दुरूपयोग. राष्ट्रद्रोह (UAPA) जैसे क्रूर और अलोकतांत्रिक कानूनों को आये दिन इस्तेमाल यह दर्शाता है कि हम अंग्रेजी हुकूमत से भी गये गुज़रे हैं. आज न जाने कितने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, पत्रकारों और अब युवाओं को भी इस कानून के ज़रिये निशाना बनाया गया है.

इस देश के चिंतित और अलग अलग क्षेत्रों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हम नागरिक केंद्र सरकार की निंदा करते हैं. हम इस लोकतंत्र को सत्तावादी तंत्र में परिवर्तित होते मूक दर्शक बन कर नहीं देख सकते। पैतीस हज़ार से अधिक लोगों ने सरकार का इस मामले में खण्ड़न किया है और भारत के संवैधानिक लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए यह अपील की है:

इस संदर्भ में हमारी मांगें:

1. दिशा रवि को तुरंत रिहा किया जाए और उस पर लगाये सारे आरोप खारिज किये जायें। साथ ही शांतनु मलिक और निकिता जेकब पर जारी वारंट भी वापिस लिए जाएं और सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय न्याय के लिये संघरशील युवा और अन्य कार्यकर्ताओं का दमन बंद किया जाए।

2. न्याय और देश-समाज के भविष्य के लिये कार्यरत संगठनों
के साथ उनके द्वारा उठाये जारहे मुद्दों पर सरकार और नीतिनिर्माताओं को खुले संवाद के लिए आगे आना चाहिए।

3. UAPA जैसे कानूनों के औचित्य और दुशरभावों का पारदर्शिता से पुनह अवलोकन होना चाहिये और इसके उपयोग पर नियंत्रण लगना चाहिये. इसकी जगह संवैधानिक न्याय प्रणाली के अंतर्गत डेज़ह की सुरक्षा के कानून बनने चाहिए।

4. विकास, रोज़गार, आजीविकाओं और पर्यावरण के क्षेत्रों में नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया को पूर्ण तरीके से लोकतांत्रिक किया जाए। इसमें सबसे दलित और शोषित समुदायों, महिलाओं, युवाओं के हितों और उनकी भागीदारी और नेतृत्व को सुनिश्चित करना चाहिए।

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क:

मीरा संघमित्र
जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय,

आशीष कोठारी,
लियो सलदाना,

कविता श्रीवास्तव
पर्यावरणीय न्याय के लिए गठबंधन

पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज


ಪತ್ರಿಕಾ ಪ್ರಕಟಣೆ

19, ಫೆಬ್ರವರಿ 2021

ಪ್ರಜಾಪ್ರಭುತ್ವದ ಕತ್ತು ಹಿಸುಕಬೇಡಿ

ಭಾರತದ ಸುರಕ್ಷಿತ ಭವಿಷ್ಯಕ್ಕಾಗಿ ಯುವಜನತೆಯೊಂದಿಗೆ ಸಂವಾದ ಬೆಳೆಸಿ

ಜನಾಂದೋಲನಗಳ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಒಕ್ಕೂಟ,

ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಪರಿಸರ ನ್ಯಾಯಕ್ಕಾಗಿ ಒಕ್ಕೂಟ,

ಪೀಪಲ್ಸ್ ಯೂನಿಯನ್ ಫಾರ್ ಸಿವಿಲ್ ಲಿಬರ್ಟೀಸ್  (ನಾಗರಿಕ ಸ್ವಾತಂತ್ರö್ಯಗಳಿಗಾಗಿ ಜನರ ಒಕ್ಕೂಟ – ಪಿಯುಸಿಎಲ್) ಪ್ರಕಟಣೆ

ದಿಶಾ ರವಿ ಸೇರಿದಂತೆ ಯುವ ಕಾರ್ಯಕರ್ತರನ್ನು ಗುರಿಯಾಗಿಸಿಕೊಂಡು ಸರ್ಕಾರದ ಕಾನೂನುಬಾಹಿರ ಮತ್ತು ಎಸಗಿದ ಕ್ರಿಯೆಗೆ ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತಿರುವ ಅಸಮಾನ ಮತ್ತು ತೀವ್ರ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯೆ/ಕ್ರಮಗಳ ವಿರುದ್ಧ ಮತ್ತು ಭಿನ್ನಾಭಿಪ್ರಾಯವನ್ನು ಅಪರಾಧೀಕರಿಸುವ ಸರ್ಕಾರದ ಉದ್ದೇಶವನ್ನು ಖಂಡಿಸಿ ಇಂದು ಕಲಾವಿದರು, ಪರಿಸರ ಮತ್ತು ಸಾಮಾಜಿಕ ಕಾರ್ಯಕರ್ತರು, ಪೋಷಕರು, ಶಿಕ್ಷಕರು, ವೃತ್ತಿಪರರು, ಆದಿವಾಸಿಗಳು, ದಲಿತರು ಮತ್ತು ರೈತರು ಸೇರಿದಂತೆ ಪ್ರಮುಖ ಜನರ ಬಳಗ ಇಂದು  ಧ್ವನಿಯೆತ್ತಿದೆ.

ಭಾರತೀಯ ಪ್ರಭುತ್ವದಿಂದ ಯುವ ಪರಿಸರ ಕಾರ್ಯಕರ್ತರ ಮೇಲೆ ನಡೆಯುತ್ತಿರುವ ದಾಳಿಯು, ಅಭಿವ್ಯಕ್ತಿ ಸ್ವಾತಂತ್ರö್ಯ ಮತ್ತು ಭಿನ್ನಾಭಿಪ್ರಾಯದ ಪ್ರಜಾತಾಂತ್ರಿಕ ಹಕ್ಕನ್ನು  ಸರ್ವಾಧಿಕಾರಿ ಧೋರಣೆಯಿಂದ ಹತ್ತಿಕ್ಕುವ ಟ್ರೆಂಡ್ ಬೆಳೆಯುತ್ತಿರುವುದರ ಲಕ್ಷಣವಾಗಿದೆ. ಇದರ ಬದಲು ಸರ್ಕಾರ  ಮಾತುಕತೆಗಳಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳುವ ಮೂಲಕ ನಿಜವಾದ ಪ್ರಜಾತಾಂತ್ರಿಕ ನಿಲುವನ್ನು ಪ್ರದರ್ಶಿಸಬೇಕಿತ್ತು.  ದೇಶದ ಯುವಕರ ಮಾತು ಆಲಿಸುವ ಬದಲು, ೨೨ ವರ್ಷದ ಯುವ ಪರಿಸರ  ಕಾರ್ಯಕರ್ತೆ ದಿಶಾ ರವಿ ಅವರನ್ನು ನಡೆಸಿಕೊಂಡ ರೀತಿ, ಕಾನೂನಿನ ನಿಯಮಗಳನ್ನು ಉಲ್ಲಂಘಿಸಲು ಮತ್ತು  ಸ್ಥಾಪಿತ ಕಾರ್ಯವಿಧಾನದ ಪ್ರಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಉಲ್ಲಂಘಿಸಲು ಬಯಸುವ ಪ್ರಭುತ್ವದ  ವಿಶಿಷ್ಟ ಲಕ್ಷಣಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿದೆ. ನಿಕಿತಾ ಜಾಕೋಬ್ ಮತ್ತು ಶಾಂತನು ಮುಲುಕ್ ಎಂಬ ಇಬ್ಬರು ಯುವಕರ ವಿರುದ್ಧ ಹೊರಡಿಸಲಾದ ವಾರಂಟ್‌ಗಳು ಮತ್ತು ದಿಶಾ ಅವರ ‘ಆಯ್ದ’ ಖಾಸಗಿ ಸಂದೇಶಗಳನ್ನು ಮಾಧ್ಯಮಗಳಿಗೆ ಸೋರಿಕೆ ಮಾಡಿದ್ದು- ಇವೆಲ್ಲವೂ ಭಾರತವನ್ನು ಅಸ್ಥಿರಗೊಳಿಸುವ ಅಂತಾರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಪಿತೂರಿಯ ಭಾಗವಾಗಿ ಈ ಯುವಕರನ್ನು ಚಿತ್ರಿಸುವ ಪ್ರಯತ್ನಗಳಾಗಿವೆ.

ಈ ಕ್ರಮಗಳು, ರಾಷ್ಟ್ರದ ಅತ್ಯಂತ ತುರ್ತಿನ, ಒತ್ತಡದ ಅಗತ್ಯಳಾದ  ರೈತರ ಬಿಕ್ಕಟ್ಟು, ಜೀವವೈವಿಧ್ಯದ ಏರುಪೇರು ಮತ್ತು ಕೋಟ್ಯಂತರ ಜನರ ಆರ್ಥಿಕ ಅಭದ್ರತೆಯಂತಹ ವಿಷಯಗಳಿಂದ ಸಾರ್ವಜನಿಕ ಗಮನವನ್ನು ಬೇರೆಡೆಗೆ ತಿರುಗಿಸುವ ಗುರಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿವೆ. ಈ ಸಮಸ್ಯೆಗಳನ್ನು ಪರಿಹರಿಸಲು ತನ್ನ ಎಲ್ಲ ಗಮನವನ್ನು ಕೇಂದ್ರೀಕರಿಸುವ ಬದಲು,ಸರ್ಕಾರವು ಪಿತೂರಿ ಮತ್ತು ಭಯೋತ್ಪಾದನೆಯ ತಪ್ಪು ನೆರೇಟಿವ್‌ಗಳನ್ನು ಸಿದ್ಧಪಡಿಸುತ್ತಿದೆ. ಈಗ ಟಾರ್ಗೆಟ್ ಮಾಡಲ್ಪಟ್ಟ ಹಲವು ಯುವಜನರು  ಅಥವಾ ಸಾಮಾಜಿಕ ಮತ್ತು ಪರಿಸರ ಸಂಬಂಧಿ ವಿಷಯಗಳಲ್ಲಿ ಭಾಗಿಯಾಗಿರುವ ಲಕ್ಷಾಂತರ ಯುವಕರ ಕೆಲಸ-ಕಾರ್ಯಗಳಲ್ಲಿ ದೇಶದ್ರೋಹ ಅನ್ನುವಂಥದ್ದು ಏನೂ ಇಲ್ಲ. ತಮ್ಮ ಸಾಮೂಹಿಕ ಭವಿಷ್ಯದ ಬಗ್ಗೆ ಮತ್ತು ದೇಶದ ಭವಿಷ್ಯದ ಬಗ್ಗೆ ಪ್ರಭುತ್ವ ಗಮನಹರಿಸದ ಕಾರಣ, ಪ್ರಭುತ್ವಕ್ಕೆ ಸವಾಲು ಹಾಕುವುದು ದೇಶದ್ರೋಹದ ಕಾರ್ಯವಲ್ಲ.

ಪ್ರತಿಭಟನಾ ನಿರತ ರೈತರೊಂದಿಗೆ ಸಂವಾದದಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳಲು ಅಸಮರ್ಥವಾಗಿರುವ ಮತ್ತು ಇಷ್ಟವಿಲ್ಲದ ಸರ್ಕಾರವು ಖಲಿಸ್ತಾನಿ ಹಣೆಪಟ್ಟಿಯನ್ನು ಹಚ್ಚುವ ಮೂಲಕ ಒಬ್ಬರಿಲ್ಲೊಬ್ಬರಿಗೆ ಕಳಂಕ ತರುವ ಪ್ರಯತ್ನದಲ್ಲಿ ನಿರತವಾಗಿದೆ. ಈಗಾಗಲೇ, ಆಡಳಿತ ವ್ಯವಸ್ಥೆ ಈ ಸ್ವಾಭಾವಿಕ ಮತ್ತು ಜನಪ್ರಿಯ ರೈತರ ಆಂದೋಲನವನ್ನು ‘ಖಲಿಸ್ತಾನಿ’ ಮತ್ತು ಪ್ರತ್ಯೇಕತಾವಾದಿ ಎಂದು ಚಿತ್ರಿಸಲು ಪ್ರಯತ್ನಿಸಿದ್ದಾರೆ; ಈಗ ಅವರು ಯುವ ಪರಿಸರ ಕಾರ್ಯಕರ್ತರೊಂದಿಗೆ ಅದೇ ರೀತಿ ಮಾಡುತ್ತಿದ್ದಾರೆ. ಇದು ನಾಚಿಕೆಗೇಡಿನ, ಮಿತಿಮೀರಿದ ಮತ್ತು ಭಯಭೀತಿ ಹುಟ್ಟಿಸುವ ಪ್ರಭುತ್ವದ ಲಕ್ಷಣವಾಗಿದೆ.

ಇನ್ನೂ ಆತಂಕಕಾರಿ ಎಬಂತೆ, ಯುಎಪಿಎಯಂತಹ ಪ್ರಜಾಪ್ರಭುತ್ವ ವಿರೋಧಿ ಕಾನೂನುಗಳ ಪದೇ ಪದೇ ಬಳಕೆ ಮಾಡಲಾಗುತ್ತಿದೆ ಅಥವಾ ವಸಾಹತುಶಾಹಿ ಯುಗದ ದೇಶದ್ರೋಹದ ಆರೋಪಗಳನ್ನು ಹೊರಿಸಲಾಗುತ್ತಿದೆ, ಇದು ವಸಾಹತುಶಾಹಿ ಕಾಲಕ್ಕಿಂತಲೂ ಹೆಚ್ಚು  ಹೆಚ್ಚಾಗಿ ಬಳಸಲ್ಪಡುತ್ತಿದೆ! ಅನೇಕ ಹಿರಿಯ ಆಕ್ಟಿವಿಸ್ಟ್ಗಳು, ವೃತ್ತಿಪರರು, ಶಿಕ್ಷಣತಜ್ಞರು, ಪತ್ರಕರ್ತರು ಮತ್ತು ಇತರರ ವಿರುದ್ಧ ಇವುಗಳನ್ನು ಬಳಸಲಾಗಿದೆ; ಈಗ ಅವುಗಳನ್ನು ಯುವ ಜನರ ವಿರುದ್ಧ ಬಳಸಲಾಗುತ್ತಿದೆ.

ಶಿಕ್ಷಕರು, ಪೋಷಕರು, ಸಂಶೋಧಕರು, ಪರಿಸರ ಮತ್ತು ಸಾಮಾಜಿಕ ಕಾರ್ಯಕರ್ತರು, ಆದಿವಾಸಿಗಳು, ದಲಿತರು, ರೈತರು ಮತ್ತು ವಿವಿಧ ಆಂದೋಲನಗಳನ್ನು ಪ್ರತಿನಿಧಿಸುವ ವೃತ್ತಿಪರರು, ನೆಟ್‌ವರ್ಕ್ಗಳು ಮತ್ತು ವಲಯಗಳು ಪ್ರತಿನಿಧಿಸುತ್ತಿದ್ದಾರೆ, ಕೇಂದ್ರ ಸರ್ಕಾರದ ಈ ಕ್ರಮಗಳ ಬಗ್ಗೆ ನಾವು ತುಂಬಾ ಆತಂಕಿತರಾಗಿದ್ದೇವೆ. ಇಂತಹ ಕ್ರಮಗಳು ಭಾರತೀಯ ಪ್ರಭುತ್ವವು ಹೆಚ್ಚು ಸರ್ವಾಧಿಕಾರವಾದದತ್ತ ಸಾಗುತ್ತಿರುವ ಪ್ರವೃತ್ತಿಯನ್ನು ಸೂಚಿಸುತ್ತದೆ. ೩೫,೦೦೦ಕ್ಕೂ ಹೆಚ್ಚು ಜನರು ಸರ್ಕಾರದ ಕ್ರಮಗಳನ್ನು ಖಂಡಿಸಿದ್ದಾರೆ ಮತ್ತು ಭಾರತದ ಪ್ರಜಾಪ್ರಭುತ್ವ ಪರಂಪರೆಯನ್ನು ಎತ್ತಿಹಿಡಿಯಬೇಕೆಂದು ಕರೆ ನೀಡಿದ್ದಾರೆ:

ಈ ಬೆಳವಣಿಗೆಗಳ ಹಿನ್ನೆಲೆಯಲ್ಲಿ, ನಾವು ಈ ಕ್ರಮಗಳನ್ನು ಒತ್ತಾಯಿಸುತ್ತೇವೆ:

೧. ದಿಶಾ ರವಿ ಅವರ ವಿರುದ್ಧದ ಎಲ್ಲಾ ಆರೋಪಗಳನ್ನು ತಕ್ಷಣ ಹಿಂತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳಬೇಕು. ಶಾಂತನು ಮುಲುಕ್ ಮತ್ತು ನಿಕಿತಾ ಜಾಕೋಬ್ ವಿರುದ್ಧದ ವಾರಂಟ್‌ಗಳನ್ನು ಸಹ ಕೈಬಿಡಬೇಕು. ರೈತರ ಆಂದೋಲನ ಮತ್ತು ಸಾಮಾಜಿಕ ಮತ್ತು ಪರಿಸರ ನ್ಯಾಯದ ಹೋರಾಟಗಳನ್ನು ಬೆಂಬಲಿಸುತ್ತಿರುವ ಯುವಕರ ವಿರುದ್ಧ ಮುಂದೆ ಯಾವ ಕ್ರಮಗಳನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳಬಾರದು.

೨. ಭಾರತದ ಪ್ರಸ್ತುತ ಮತ್ತು ಭವಿಷ್ಯದ ಪೀಳಿಗೆಗಳನ್ನು ಕಾಪಾಡುವಂತಹ ನೀತಿಗಳು ಮತ್ತು ಕಾರ್ಯಕ್ರಮಗಳನ್ನು ರೂಪಿಸಲು, ಪರಿಸರ ಮತ್ತು ಸಾಮಾಜಿಕ ಕ್ರಿಯಾ ಗುಂಪುಗಳೊAದಿಗೆ ಮತ್ತು ಅವರ ಭವಿಷ್ಯದ ಬಗ್ಗೆ ಅವರ ಸಮರ್ಥನೀಯ ಕಾಳಜಿಗಳೊಂದಿಗೆ ಪ್ರಶ್ನಿಸುತ್ತಿರುವ ಯುಜನತೆಯೊಂದಿಗೆ ಮುಕ್ತ ಸಂವಾದವನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಬೇಕು.

೩. ರಾಷ್ಟçಮಟ್ಟದಲ್ಲಿ ದೇಶದ್ರೋಹ, ಯುಎಪಿಎಯಂತಹ ಕಾನೂನು ನಿಬಂಧನೆಗಳ ಪಾರದರ್ಶಕ ವಿಮರ್ಶೆಯನ್ನು,  ಈ ಕಾನೂನುಗಳನ್ನು  ಬದಲಿಸುವ ಉದ್ದೇಶದಿಂದ ಭಾರತದ ಜನರನ್ನು ಸಂವಿಧಾನಾತ್ಮಕವಾಗಿ ಪ್ರಜಾಪ್ರಭುತ್ವ ಹಕ್ಕುಗಳ ಚೌಕಟ್ಟಿನೊಳಗೆ ಭದ್ರಪಡಿಸಿಕೊಳ್ಳಲು ಸಹಾಯ ಮಾಡುವ ನಿಬಂಧನೆಗಳೊAದಿಗೆ ಪ್ರಾರಂಭಿಸಬೇಕು.

೪. ಅಭಿವೃದ್ಧಿ, ಪರಿಸರ ಮತ್ತು ಜೀವನೋಪಾಯಗಳ ಬಗ್ಗೆ ನಿರ್ಧಾರ ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುವ ಎಲ್ಲಾ ಪ್ರಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಆಳವಾಗಿ ಪ್ರಜಾಪ್ರಭುತ್ವಗೊಳಿಸಬೇಕು, ದುರ್ಬಲ ಸಮುದಾಯಗಳು ಮತ್ತು ಕ್ಷೇತ್ರಗಳ (ಮಹಿಳೆಯರು, ಯುವಕರು, ‘ಅಂಗವಿಕಲರು’ ಮತ್ತು ಎಲ್‌ಜಿಬಿಟಿಕ್ಯೂ ಸೇರಿದಂತೆ), ಮತ್ತು ಸಮಸ್ಯೆಗೊಳಗಾದ ಅಥವಾ ಆಸಕ್ತ ನಾಗರಿಕರ ಪ್ರಮುಖ ಒಳಗೊಳ್ಳುವಿಕೆಯನ್ನು ಖಾತ್ರಿಪಡಿಸಿಕೊಳ್ಳಬೇಕು.


ಆಶಿಶ್ ಕೊಠಾರಿ,

ಲಿಯೋ ಎಫ್. ಸಲ್ಡಾನಾ, ಭಾರತದಲ್ಲಿ ಪರಿಸರ ನ್ಯಾಯಕ್ಕಾಗಿ ಒಕ್ಕೂಟ,

ಮೀರಾ ಸಂಘಮಿತ್ರ, ಜನಾಂದೋಲನಗಳ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಒಕ್ಕೂಟ,

ಕವಿತಾ ಶ್ರೀವಾಸ್ತವ, ಪಿಯುಸಿಎಲ್,

 প্রেস রিলিজ

19 ফেব্রুয়ারী 2021

গণতন্ত্র কণ্ঠরোধ করা বন্ধ করো!

ভারতের নিরাপদ ভবিষ্যতের জন্য যুবকের সাথে ডায়ালগ প্রবেশ করুন!

জারি করচেন

National Alliance of People’s Movements

Coalition for Environmental Justice in India

People’s Union for Civil Liberties

শিল্পী, পরিবেশগত ও সামাজিক কর্মী, অভিভাবক, শিক্ষক, পেশাজীবী, আদিবাসী, দলিত এবং কৃষকসহ একাধিক বিশিষ্ট ব্যক্তি আজ দিশা রবি সহ তরুণ কর্মীদের লক্ষ্যবস্তু করার ক্ষেত্রে সরকারের অবৈধ ও বৈষম্যমূলক প্রতিক্রিয়ার বিরুদ্ধে, এবং সরকার মতবিরোধকে অপরাধী করার উদ্দেশ্যে বক্তব্য রেখেছিলেন l আজ আয়োজিত এক সংবাদ সম্মেলনে কবিতা শ্রীবাস্তব, নাগরাজ আদভে, রাম ওয়াংখিরইকপম, মেধা পাটকর, সন্দীপ পান্ডে, টি এম কৃষ্ণ, মীরা সংহমিত্র, অভিলাষ সিং, আশীষ কোঠারি, নিত্যানন্দ জয়রামণ, লিও সালদানহা, ভি ভি সুরেশ, বিনয় শ্রীনিবাস, উলকা মহাজন, সমাজের বিবিধ বিশিষ্ট জন, এই বিষয় এর ওপর প্রতিক্রিয়া জানিয়েছেন l

ভারতীয় রাষ্ট্র কর্তৃক যুব জলবায়ু কর্মীদের উপর চলমান আক্রমণটি গণতান্ত্রিক বাকস্বাধীনতার অধিকারকে মোকাবিলার অস্ত্র হয়ে উঠেছে. যোদিয়ও কর্তৃত্ববাদী শক্তির সাথে ভিন্নমত পোষণের ক্রমবর্ধমান প্রবণতার ayi লক্ষ্নী সত্যিকারের গণতান্ত্রিক জাতির উপযোগী হবে। ২২ বছরের জলবায়ু কর্মী দিশা রবির সাথে যেভাবে আচরণ করা হয়েছে, তার এমন একটি রাষ্ট্রের বৈশিষ্ট্য রয়েছে যা দেশের যুবসমাজের কথা শোনার পরিবর্তে আইনের শাসনকে তুষ্ট করতে ইচ্ছুকভাবে প্রস্তুত এবং পদ্ধতিগত নিয়মগুলি প্রতিষ্ঠিত করে। দিশার ব্যক্তিগত বার্তাগুলি থেকে মিডিয়াতে নিকিতা জ্যাকব ও শান্তন মুলুক এবং আরও দুটি যুবকের বিরুদ্ধে জারি করা পরোয়ানা হ’ল এই অল্পবয়সিদের ভারতকে অস্থিতিশীল করার একটি আন্তর্জাতিক ষড়যন্ত্রের অংশ হিসাবে আঁকার চেষ্টা।

এই ক্রিয়াকলাপগুলির লক্ষ্য হচ্ছে দেশের সবচেয়ে চাপের চাহিদা যেমন কৃষকদের সংকট, পরিবেশগত বিপর্যয় এবং কয়েক লক্ষ লক্ষ মানুষের অর্থনৈতিক নিরাপত্তাহীনতা থেকে জনসাধারণের দৃষ্টি সরিয়ে দেওয়া। সরকার এই বিষয়গুলি মোকাবিলা সমস্ত মনোযোগ দেওয়ার পরিবর্তে, ষড়যন্ত্র ও সন্ত্রাসবাদের স্পষ্টতই মিথ্যা বিবরণী তৈরি করছে। তরুণদের লক্ষ্যবস্তু করা বা তাদের সামাজিক ও পরিবেশগত সমস্যাগুলির সাথে জড়িত কয়েক হাজার অন্যান্য যুবকের ক্রিয়াকলাপে রাষ্ট্রদ্রোহজনক কিছুই নেই। তাদের সম্মিলিত ভবিষ্যত এবং দেশের ভবিষ্যতের প্রতি মনোযোগের অভাবের জন্য রাষ্ট্রকে চ্যালেঞ্জ জানানো রাষ্ট্রদ্রোহ কাজ নয়।

প্রতিবাদী কৃষকদের সমস্যার সমাধান করতে অক্ষম এবং অনিচ্ছুক, সরকার কাউকে বা অন্যকে কলুষিত করার জন্য খালিস্তানি ব্রাশটি ব্যবহারের চেষ্টাতে ব্যস্ত। ইতিমধ্যে, শাসক প্রশাসনের সদস্যরা এই জৈব ও জনপ্রিয় কৃষকদের আন্দোলনকে ‘খালিস্তানী’ এবং বিচ্ছিন্নতাবাদী হিসাবে আঁকার চেষ্টা করেছেন; যুব পরিবেশ কর্মীদের সাথে এখন তারা একই কাজ করেছেন। এটি খুবই লজ্জাজনক এবং উতপিডোক রাষ্ট্রের বৈশিষ্ট্য।

ইউএপিএ-এর মতো অগণতান্ত্রিক আইনগুলির বিরক্তিকর ঘন ঘন ব্যবহার, বা উপনিবেশিক যুগের রাষ্ট্রদ্রোহের অভিযোগের তুলনায় যে স্বাচ্ছন্দ্য বয়ে আনা হচ্ছে, তা উপনিবেশিক আমলের তুলনায় অনেক বেশি ব্যবহার করা হচ্ছে ! এগুলি বহু প্রবীণ কর্মী, পেশাদার, শিক্ষাবিদ, সাংবাদিক এবং অন্যদের বিরুদ্ধে ব্যবহৃত হয়েছে; এখন তারা খুব অল্প বয়সীদের বিরুদ্ধে ব্যবহার করা হচ্ছে।

শিক্ষক, পিতা-মাতা, গবেষক, পরিবেশগত ও সামাজিক কর্মী, আদিবাসী, দলিত, কৃষক এবং পেশাদাররা যেহেতু বিস্তৃত আন্দোলন, নেটওয়ার্ক এবং সেক্টরের বিস্তৃত প্রতিনিধিত্ব করছেন, আমরা কেন্দ্রীয় সরকারের এই পদক্ষেপ নিয়ে গভীরভাবে উদ্বিগ্ন। এই জাতীয় পদক্ষেপগুলি ভারতীয় রাষ্ট্রের প্রবণতাগুলি আরও কর্তৃত্ববাদের দিকে এগিয়ে যাওয়ার ইঙ্গিত দেয়। ৩৫,০০০ এরও বেশি লোক সরকারের এই পদক্ষেপের নিন্দা করেছে এবং ভারতের গণতান্ত্রিক ওইটিজ কে সমর্থন করার আহ্বান জানিয়েছে

উপরের আলোকে আমরা দাবি করছি:

১. দিশা রবিকে তার বিরুদ্ধে করা সমস্ত অভিযোগ প্রত্যাহার করে অবিলম্বে মুক্তি দিতে হবে। শান্তনু মুলুক এবং নিকিতা জ্যাকবের বিরুদ্ধে পরোয়ানাও বাতিল করতে হবে এবং কৃষকদের আন্দোলন এবং সামাজিক ও পরিবেশগত বিচারের কারণগুলি সমর্থনকারী যুবকদের বিরুদ্ধে আর কোনও ব্যবস্থা নেওয়া উচিত নয়।

২. ভারতের বর্তমান ও ভবিষ্যত প্রজন্মকে সুরক্ষিত করতে পারে এমন নীতি ও কর্মসূচি নিয়ে আসতে যুব পরিবেশ ও সামাজিক কর্ম গ্রুপ এবং তাদের ভবিষ্যত সম্পর্কে তাদের ন্যায়সঙ্গত উদ্বেগের সাথে একটি মুক্ত আলোচনা শুরু করতে হবে।

৩. জাতীয় স্তরের, রাষ্ট্রদ্রোহের মতো আইনী বিধান এবং ইউএপিএ-এর মতো আইনের স্বচ্ছ পর্যালোচনা অবশ্যই তাদের পরিবর্তনের বিধানের সাথে শুরু করতে হবে যা ভারতের জনগণকে সাংবিধানিকভাবে গণতান্ত্রিক অধিকারের কাঠামোর মধ্যে সুরক্ষিত করতে সহায়তা করে।

৪. উন্নয়ন, পরিবেশ ও জীবিকার বিষয়ে সিদ্ধান্ত গ্রহণের সমস্ত প্রক্রিয়াগুলি অবশ্যই গভীরভাবে গণতান্ত্রিকভাবে গণ্য করতে হবে, যাতে ক্ষতিগ্রস্থ জনগোষ্ঠী এবং বিভাগগুলির (নারী, যুবক, ‘প্রতিবন্ধী’, এবং এলজিবিটিকিউ + সহ) এবং আক্রান্ত বা আগ্রহী নাগরিকদের জড়িত হওয়া নিশ্চিত করতে হবে।


আশীষ কোঠারি,

লিও এফ সালদানহা, Coalition for Environmental Justice in India,

মীরা সংহমিত্র, National Alliance of People’s Movements,

কবিতা শ্রীবাস্তব

NAPM India